शुक्रवार, 30 नवंबर 2007

आई हैव अ ड्रीम


अक्सर मरघट के पास से गुज़रते वक्त पूरे शरीर में झुरझुरी सी होती हैं...डर बिल्कुल नहीं लगता, चाहे रात का समय ही क्यों न हो...बस ज़हन में एक सवाल हलचल मचाता है...मौत क्या होती है...मरने से पहले तो शायद ही इसका जवाब मिले... लेकिन अति जिज्ञासु मन नहीं मानता...वो तो आज ही जानना चाहता हैं...अब मैं कोई मार्टिन लूथर तो हूं नहीं कि कह दू ' आई हैव अ ड्रीम' और क्रांति हो जाए...

शनिवार, 10 नवंबर 2007

बातों का क्या ?


बातें हमेशा बड़ी होनी चाहिए- या यूं कहूं कि, हमेशा होती है तो शायद ठीक रहे...मुंह छोटा हो तो छोटी से छोटी बात भी बड़ी हो जाती हैं, और अगर मुंह बड़ा हैं तो फिर बात अपने आप बड़ी हो जाती हैं...किशोर दा के गाने सुनकर बड़ा हुआ हूं...लेकिन, जब कसमें वादे प्यार वफा सब बातें हैं...बातों का क्या...सुनता हूं तो थोड़ा विरोधाभाषी हो जाता हूं...क्योंकि दुनिया के चार सबसे हसीन तत्व अगर बातें हैं...तो क्यों न बातें ही की जाएं, लेकिन बड़ी- बड़ी...मुझे ज्ञान से दो तरफा दुविधा हैं...न सुनना चाहता हूं, न सुनाना चाहता हूं...

चंद्रभुवन