सोमवार, 29 सितंबर 2008


कुछ सुनना चाहता हूं
न कुछ सुनाना चाहता हूं
जिंदगी को गुमसुम सा बिताना चाहता हूं
यार हों यारी हो दोस्तों का साथ मिले
इस चाहत को बस हसरतों में पालना चाहता हूं
मेरे समय की शायद नहीं ये फिज़ा
लेकिन इसी फिज़ां में सांसों को ढालना चाहता हूं
कुछ मिलना न मिलना मुकद्दर की बात है
मिलने की आस को मुगालते में चाहता हूं
मेरी मंजिल कहां है मुझे नहीं मालूम
रास्ते के हर नज़ारे का तसव्वुर चाहता हू
खुशी और जीत पर बहुत हो चुका
हार और ग़मों की ईद मनाना चाहता हूं।।

गुरुवार, 25 सितंबर 2008


रेत पर

मैं बनाता रहा महल

तुमने मदद भी की

मेरा हाथ बंटाया

अपने हाथों से थपकी देकर

उसे ऐसा बनाया कि, वो

सच्चा लगा

और फिर एक दिन

उसे तोड़ दिया

अपने गुरूर को जिंदा रखने के लिए।