गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008


आईना, देखता हूं जब भी
बहुत दूर तक नज़र आता है,
हर वो चीज़ दिखती है
जिससे मेरा सरोकार है
प्यार, दुख, दिन रात
छोटा, बड़ा, ऊंचा, नीचा, पहाड़, पानी
हर चीज़ साफ दिखती है,
बस खुद का चेहरा ढूंढ रहा हूं।।

सोमवार, 29 सितंबर 2008


कुछ सुनना चाहता हूं
न कुछ सुनाना चाहता हूं
जिंदगी को गुमसुम सा बिताना चाहता हूं
यार हों यारी हो दोस्तों का साथ मिले
इस चाहत को बस हसरतों में पालना चाहता हूं
मेरे समय की शायद नहीं ये फिज़ा
लेकिन इसी फिज़ां में सांसों को ढालना चाहता हूं
कुछ मिलना न मिलना मुकद्दर की बात है
मिलने की आस को मुगालते में चाहता हूं
मेरी मंजिल कहां है मुझे नहीं मालूम
रास्ते के हर नज़ारे का तसव्वुर चाहता हू
खुशी और जीत पर बहुत हो चुका
हार और ग़मों की ईद मनाना चाहता हूं।।

गुरुवार, 25 सितंबर 2008


रेत पर

मैं बनाता रहा महल

तुमने मदद भी की

मेरा हाथ बंटाया

अपने हाथों से थपकी देकर

उसे ऐसा बनाया कि, वो

सच्चा लगा

और फिर एक दिन

उसे तोड़ दिया

अपने गुरूर को जिंदा रखने के लिए।

गुरुवार, 7 अगस्त 2008

फुर्सत


थोड़ी

फुर्सत सी है इन दिनों

दिलों-दिमाग को,

लग रहा है जैसे

सिर का ऊपरी हिस्सा

जिसमें अक्सर भारीपन रहता था

गिरा दिया हो किसी ने

अनचाहे गर्भ की तरह

सोमवार, 5 मई 2008

मैं रोया परदेस में...!


मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार


दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार


निदा फाज़ली का ये कलाम बहुत गहराई तक उतर जाता हैं,,, मैं अक्सर रोता नहीं अपने दर्द में तो कतई नहीं हां कभी-कभी दूसरों का दुख जरूर आंखे नम कर देता है,,, जब कोई गिलहरी अपने अंतिम समय में मेरे हाथों में ऐसे आ जाती हैं मानों मैं उसे बचा लुंगा,,, मरने नहीं दुंगा उसे, उसकी हर तड़प को मैं सह लुंगा, लेकिन मेरे हाथों में वो दम तोड़ देती है,,,, मैं रोता हूं- जब कोई घायल चिड़िया जो उड़ नहीं सकती लेकिन मुझे देखकर अपने कुचले हुए पंखों से उड़ने की नाकाम कोशिश में फड़फड़ाती है, मैं उसे पकड़ लेता हूं और पानी पिलाने की कोशिश करता हूं, लेकिन पानी पीते पीते उसकी गर्दन जो अब तक तनी हुई थी एक तरफ हो जाती है।

सोमवार, 7 अप्रैल 2008


सोच की सीमाओं से
सत्य की परिभाषाओं से
छोटी और बड़ी लकीरों से
राजा और फकीरों से
एक सुलझन,
बुनने को
कब से तैयार बैठा हूं,,,,

सोमवार, 31 मार्च 2008

सड़क-सोच


सेंसेक्स का सांड कुलांचे भर भर कर लगता है थक गया है,,,,तभी पिछले कुछ दिनों से डाउन डाउन सा फिर रहा है.... खैर, पिछले कुछ महीनों में अगर सेंसेक्स के उछाल ने आपकी जेबें गरम कर दी हों तो... ज्यादा इतराइए मत अपने आटे दाल के पीपों पर नज़र डालिए, साथ में सब्ज़ी की डलिया को भी टटोल लीजिए सिवाय महंगाई के आपकों इनमें कुछ और मिलने से रहा।

लेकिन मैं ये बाते यहां क्यों कर रहा हूं... मैं तो शादीशुदा भी नहीं हूं, न ही मेरी कोई कथित पत्नी है जो बिन ब्याहे मेरे साथ रहती हो... कोठरी में आटे दाल के पीपे भी नहीं रखता... साला न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। बस एक सब्जी की डलिया ज़रूर है जिसे कभी कभार, जब घर में कोई आने वाला होता हैं तो एक धड़ी आलू और दो किलो प्याज़ से भर देता हूं... टमाटर तो बस ऐसे रखता हूं जैसे सौफ्टी में चेरी लगा दी हो... बस दो तीन ऊपर से...