सोमवार, 5 मई 2008

मैं रोया परदेस में...!


मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार


दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार


निदा फाज़ली का ये कलाम बहुत गहराई तक उतर जाता हैं,,, मैं अक्सर रोता नहीं अपने दर्द में तो कतई नहीं हां कभी-कभी दूसरों का दुख जरूर आंखे नम कर देता है,,, जब कोई गिलहरी अपने अंतिम समय में मेरे हाथों में ऐसे आ जाती हैं मानों मैं उसे बचा लुंगा,,, मरने नहीं दुंगा उसे, उसकी हर तड़प को मैं सह लुंगा, लेकिन मेरे हाथों में वो दम तोड़ देती है,,,, मैं रोता हूं- जब कोई घायल चिड़िया जो उड़ नहीं सकती लेकिन मुझे देखकर अपने कुचले हुए पंखों से उड़ने की नाकाम कोशिश में फड़फड़ाती है, मैं उसे पकड़ लेता हूं और पानी पिलाने की कोशिश करता हूं, लेकिन पानी पीते पीते उसकी गर्दन जो अब तक तनी हुई थी एक तरफ हो जाती है।

1 टिप्पणी:

CHANDAN ने कहा…

बहुत बढ़िया दोस्त,दिल को छू गई ।